गुरुवार, 6 सितंबर 2018

मित्रता सुदामा जैसी

सितंबर 06, 2018

                      मित्रता हो तो श्री कृष्ण और सुदामा जैसी

हम सभी ने किसी ना किसी के माध्यम से श्री कृष्ण और सुदामा जी की गाथाएं सुनी होगी और उनका गुणगान भी किया है मित्रता के लिए उन्होंने एक नई मिसाल पेश की है आज हम उनकी ही एक गाथा का वर्णन कर रहे हैं अच्छा लगे तो आगे भी भेजिएगा
एक बार की बात हैसुदामा और कृष्ण बैठे हुए थे तो मित्रों में अक्सर बैठकर अपने भविष्य के बारे में एक दूसरे से विचार विमर्श भी करते हैं और भविष्य की योजनाएं भी बनाते हैं उसी प्रकार सुदामा और कृष्ण बैठे थे आपस में बातें कर रहे थे कृष्ण तो अंतर्यामी थे परम ब्रह्मा जी थे सुदामा बोले हे मेरे प्रिय सखा जब हमारी कक्षाएं पूरी हो जाएगी और हमारा बिछड़ने का टाइम आएगा तो हम लोग बिछड़ जाएंगे हे कृष्ण फिर मुझे कभी आप याद करेंगे कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा नहीं मैं याद नहीं करूंगा सुदामा को बुरा लगा और मन ही मन में सोचने लगे कृष्ण मुझे क्यों याद करेगा वह तो अच्छे परिवार से है उसके तो हजारों गाय और गोलमाल साथ में हैं मुझ गरीब को क्यों याद करेगा श्री कृष्ण उनकी अंतरात्मा की बात को सुन रहे थे और धीमे धीमे मुस्कुरा भी रहे थे श्रीकृष्ण ने कहा सुदामा शायद हम कभी फिर ना मिले तो तुम क्या मुझे याद करोगे सुदामा ने सिर हिलाते हुए कहा हां करूंगा सुदामा ने कृष्ण से पूछा क्या तुम मुझे याद करोगी कृष्ण ने हंसते हुए जवाब दिया नहीं मैं याद नहीं करूंगा सुदामा को बहुत बुरा लगा और वहां से उठ कर चला गया जाते समय नहीं कृष्ण की ओर नहीं देखा कृष्ण जी समझ गए कि सुदामा मुझसे नाराज हो गया और बिछड़ने का समय आया कृष्ण सुदामा अलग अलग हो गए कई सालों तक एक दूसरे से मुलाकात नहीं हुई सुदामा की पत्नी ने और सुदामा के बच्चों ने बीते समय की बात उठाई और सुदामा से पूछा क्यों जी  आपके मित्र तो द्वारकाधीश हैं कभी उनसे मुलाकात हुई आपकी सुदामा ने कहा नहीं मेरी मुलाकात नहीं हुई है सुदामा की पत्नी ने सुदामा से कहा जाओ एक बार मुलाकात करके तो आओ सुदामा ने मना कर दिया नहीं मैं नहीं जाऊंगा वह मुझे याद नहीं करता अगर करता हूं तो सिर्फ मैं याद करता हूं वह मुझे कभी याद नहीं करता पत्नी के हजार प्रयास करने के बाद सुदामा तैयार हो गया कृष्ण से मिलने के लिए सुदामा की पत्नी ने कृष्ण को बहन के रूप में एक चावल की पोटली थी और कहा इसे अपनी शाखा को दे देना सुदामा नकहा ठीक है मैं दे दूंगा और द्वारका की ओर चलने लगा रास्ते में कई बार पानी और धूप का सामना करना पड़ा जैसे ही द्वारका में सुदामा का प्रवेश हुआ और सुदामा ने द्वारका की रंगीन नगरी को देखा सुदामा की आंखों में आंसू आ गए और कहने लगे मैं उसी दिन रात याद करता हूं लेकिन वह मुझे 1 दिन भी याद नहीं करता चलते चलतेतक पहुंच गए और द्वारपालों से कहा अरे द्वारपालो श्री कृष्ण से कह दो कि आज एक सुदामा मिलने आया है आपसे द्वारपाल श्रीकृष्ण के पास गया और कहने लगा भगवान कोई गरीब ब्राह्मण जिसके तन पर केवल एक धोती है हाथ में एक कमंडल है और मुरझाया हुआ चेहरा द्वार पर खड़ा है और अपना नाम सुदामा बता रहा है आपसे मिलने के लिए कह रहा है जैसे ही श्रीकृष्ण ने सुदामा का नाम सुना कांपने लगे मुंह से आवाज निकलने लगी सुदामा सुदामामेरे सखा सुदामा नंगे पैर भागने लगे और जोर-जोर से चिल्लाने लगे सुदामा मेरे सखा में आ रहा हूं सुदामा जब श्री कृष्ण की रानी उन्हें देखा यह कौन व्यक्ति है जो श्रीकृष्ण को इतना प्रिय भागते हुए जा रहे हैं और मुंह से सुदामा सुदामा निकल रहा है ना पैरों में कोई खड़ाऊ है नंगे पैर भागते हुए मुख्य द्वार की ओर चिल्लाते हुए सुदामा सुदामा में आ रहा सुदामा ने यह देखा तो वह आश्चर्यचकित रह गया उसने सोचा ही नहीं था कि मेरा सखा मुझे इतना प्रेम करता है मुझे इतना इश्क नहीं करता है जो मेरे लिए नंगे पैर भागता हुआ मुख्य द्वार की ओर आ रहा है और मुंह से एक ही आवाज निकल रही है सुदामा सुदामा जब दोनों लोगों ने एक दूसरे को देखा श्री कृष्ण  और सुदामा के आंखों में आंसू आ गए दोनों लोग गले लग गए और रोने लगे श्रीकृष्ण ने कहा अरे पगले मैं तुझे दिन रात याद करता हूं और करता ही रहूंगा तू मेरा सखा मेरे हृदय में वास करता है सुमन सुदामा की आंखों से आंसुओं की गंगा बहने लगी और कहने लगे हे द्वारकाधीश मैं आपको गलत समझता था मैं समझता था कि सिर्फ मैं ही आपको प्रेम और स्नेह करता हूं और याद करता हूं ऐसी होती है मित्रता मित्रों मित्रता ऐसी होनी चाहिए जय श्री कृष्णा जय सुदामा धन्यवाद मित्रों आपको मेरी यह कहानी अच्छी लगी हो तो उसे लाइक और फॉरवर्ड जरूर करें धन्यवाद

Written by

We are Creative Blogger Theme Wavers which provides user friendly, effective and easy to use themes. Each support has free and providing HD support screen casting.

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें

 

© 2013 s.k.pathak. All rights resevered. Designed by Templateism | Blogger Templates

Back To Top